देश में सोशल मीडिया को लेकर जो भी बवाल हो रहे हैं वो तो चलते रहेंगे लेकिन इसके पीछे की वजह जो क्या केवल प्राइवेसी है. या फिर इसके पीछे अलग वजह हो सकती है. विश्व में फेसबुक, व्हाट्सऐप और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया का दबदबा जिस तरह से बढ़ा है उससे कई देश परेशान हैं लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी सरकार इससे ज्यादा चिंतित है. इसके पीछे कई वजह हैं.
सोशल मीडिया के दबदबे का सबसे बड़ा उदाहरण अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में दिखा था, जब पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बैन कर दिया गया. जिस वक्त उन्हें बैन किया गया था उस वक्त वह अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर थे.
वहीं, सोशल मीडिया कई देशों के राजनेताओं के लिए अहम हथियार बनते दिख रहा है. अगर हम भारत की ही बात करें तो यहां राजनेता अब सोशल मीडिया को हथियार बनाने में जुटे हैं. जिस सोशल मीडिया को हथियार बनाकर बीजेपी आगे बढ़ी है अब शायद विपक्ष भी इसे अपना हथियार बनाना चाहते हैं. ऐसे में सरकार की चिंता बढ़ी है.
सोशल मीडिया को लेकर सरकार पर कई सवाल दागे जा रहे हैं. सरकार खुद सोशल मीडिया को समाज के लिए हानिकारक मानती है लेकिन इसके बावजूद वह इस प्लेटफॉर्म पर खुद को मजबूत करने में जुटी है. यहां तक की खुद पीएम मोदी भी सोशल मीडिया को अपना अच्छा साधन मानते हैं कि वह लोगों से जुड़ सकते हैं. लेकिन लोगों का इस प्लेटफॉर्म पर इतनी तादाद में होना उस खतरे को बताती है जिससे लोग अंजान हैं. लेकिन शायद सरकार ने उस खतरे को भांप लिया है जिससे उसे खुद नुकसान होने का संदेह हो रहा है.
देश में देसी सोशल मीडिया का चलन पर भी इसलिए जोर दिया जा रहा है कि भविष्य में किसी तरह की दिक्कत को आसानी से सुलझाया जा सके. लेकिन इससे पहले विदेशी सोशल मीडिया से निजात पाना भी सरकार के लिए जरूरी है. ये देश में सोशल मीडिया के भविष्य की चिंता से ज्यादा सरकार के खुद के भविष्य के लिए है जो आने वाले समय में उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचाएगी और ये लक्ष्य निसंदेह 2024 है.
इसमें कोई दो राय नहीं होगी कि सोशल मीडिया आज देश में वह जगह रखती है जिससे सरकार प्रभावित नहीं होती है. हम किसान आंदोलन की बात करें या हाल में चल रहे टूलकिट विवाद की. इन सब चीजों में नियंत्रण नहीं होना सरकार के लिए गले का फांस बन रहा है. तो ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि सरकार जल्द से जल्द इन सब चीजों से निजात पाना चाहती है.

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